बुधवार, 2 दिसंबर 2015

त्रासदी के तीन दशक .. खत्म नहीं हुई त्रासदी 
तीन दिसंबर 2015 यानी गैस त्रासदी को हुए इकतीस वर्ष पूरे हो चुके हैं। दो और तीन दिसंबर की दरम्यानी रात हुए इस भयावह गैस हादसे के दौरान हजारों लोग काल के गाल में समा गए वहीं लाखों लोग इस त्रासदी का दंश अब भी भोग रहे हैं। भोपाल जो शहर खूबसूरत झीलों और अपनी बेहतरीन हरियाली के लिए जाना जाता था वही भोपाल अब जहरीली गैस के लिए पहचान बना चुका है। हालांकि त्रासदी को समाप्त हुए तीस वर्ष से अधिक हो गए हैं। लेकिन जख्म अभी बाकी है।
 आज भी यूनियन कार्बाइड के उस कारखाने और उसके इर्द-गिर्द जाने पर अब सहज महसूस करेंगे कि यहां फैक्ट्री भले ही खत्म हो गई हो लेकिन उस फैक्ट्री से निकलने वाली गैस ने कितना कोहराम मचाया होगा। अनगिनत लाशों से पटी पड़ी भोपाल की उस दौर की सड़कों पर न मालूम कितनी बार डामर का मुलम्मा चढ़ गया है लेकिन उन लाशों की गर्द अभी भी यहां दफ्न है। इन लाशों पर आज भी राजनीति हो रही है। और शायद आने वाले समय में भी राजनीतिक रोटियां सेंकी जाएंगी। जिनपर गैस पीड़ितों ने यकींन किया और अपना नुमाइंदा बनाया वो भी उन्हें विश्वासघात करके चले गए और जिन्हें इनका ऐतबार हासिल नहीं हुआ वे भी भरोसा बनाए रखने के लिए यहां की समस्याओं को लेकर सरकार की लानत मलानत करते रहे। हालांकि इन दोनों के बीच फंसे गैस पीड़ित आज भी नर्क की सी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। 
कालोनियां बनाई गईं हैं। लेकिन रहवासी गैस पीड़ित हैं या बाहर के यह तय नहीं। वहीं उस काली रात जिन लोगों को यहां की जहरीली गैस में सांस लेने को मजबूर होना पड़ा वे आज भी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं जिनका इलाज बदस्तूर जारी है। वो मासूम बच्चे जिन्होंने उस काली रात की दरमियान अपनी जिंदगी का सफऱ शुरु किया वो आज भी अपने जीवन को कोसते हैं वो आज भी कोख में मर जाने को बेहतर समझते हैं। इन मासूमों की जिंदगी ही उनके लिए नासूर साबित हो रही है। वो माताएं जो अच्छे और सुखी परिवार का सपना बुन रहीं थीं उन्हें अब जीवन का सबसे कठोर दंश भोगना पड़ रहा है। इन सबके बीच इस जहरीले गैस कांड का मुख्य दोषी एंडरसन अब इस दुनिया में नहीं रहा है। 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

बेच दे

एक बड़ी नामी कंपनी का विज्ञापन देखा यह कंपनी घर का पुराना सामान बेचकर नया खरीदने के लिए लालायित कर देने वाला विज्ञापन देती है। विज्ञापन में एक पति पत्नी होते हैं दोनों ही नौकरीपेशा हैं। दोनों ही प्रायवेट सेक्टर में काम करते हैं और अपने अपने बेहतरीन करियर हैं। जाहिर है जीवन में काफी मेहनत की होगी अपना कैरियर बनाने के लिए। शादी के बाद वे पति पत्नी के तौर पर एक शानदार जीवन यापन कर रहे हैं। पति के बाद बहुत महंगी गाड़ी होती है गाड़ी एक ही है लिहाजा पति अपनी पत्नी को उसके आफिस और असाइनमेंट के मुताबिक जगह जगह छोड़ता है हालांकि दोनों के बीच समय का बेहतर समन्वय न हो पाने के कारण अकसर पत्नी को कुछ जगहों पर निराशा हाथ लगती है कहीं आफिस लेट पहुंची तो कहीं असाइनमेंट हाथ से छूट गया। लिहाजा वह झुंझलाती है और दुखी होकर अपने पति से कहती है कि मैं शादी के पहले ठीक थी काफी स्वतंत्र थी और अपने मनमर्जी से जीवन जीती थी मतलब अपनी गाड़ी थी और मन मुताबिक असाइनमेंट लेती थी। पति को अपनी पत्नी का उस पर निर्भऱ होना खला या शायद उसे दुख हुआ कि पत्नी के पास अपनी गाड़ी न होने से वह अपनी मर्जी से जिंदगी नहीं जी पा रही है। लिहाजा वह एक बोल्ड निर्णय लेते हुए अपनी बड़ी गाड़ी को बेचकर दो अपेक्षाकृत छोटी गाड़ियां खरीद लेता है और पत्नी को उसकी कार की चाबी थमा देता है। अब पति भी संतुष्ट कि उसकी पत्नी अपनी पुरानी जिंदगी फिर से जी सकेगी और उसपर निर्भर नहीं होगी वहीं पत्नि को भी अपने पति पर बड़ा प्यार आया कि उसने अपनी पत्नि की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए उसके लिए अलग से कार की व्यवस्था कर दी।
यह विज्ञापन मुझे इस नजरिये से बहुत बेहतरीन लगा कि आज की आपाधापी भरी जिंदगी में एक पति पत्नी आपस में दोस्तों की तरह का व्यवहार करते हुए एक दूसरे की स्वाधीनता और उनकी निजता का सम्मान कर रहे हैं लेकिन एक बात बहुत चुभ रही है कि क्या वाकई हम इतने व्यस्त और आपाधापी भरी जिंदगी जी रहे हैं कि हमें हमारी निजता और स्वाधीनता में थोड़ा बहुत आक्षेप भी पसंद नहीं है। हमारी जिंदगी में पैसों और अपने करियर का महत्व इतना अधिक हो गया है कि हम इसे हासिल करने के लिए शायद एक दूसरे के बारे में बिलकुल सोच भी नहीं पाते हैं। अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखता हूं तो लगता है कि शायद दूसरा जीवन कहीं बेहतर है। हम पांच भाई बहन अपने मां पिता के साथ रहते थे। बचपन बहुत खुशनुमा रहा। हर मध्यमवर्गीय परिवार की तरह छोटे छोटे संघर्ष वस्तुओं का अभाव, हसरतों भऱी निगाहों से आकर्षक सामानों को देखना और पापा मम्मी के समझाने पर समझ जाने की प्रवृति हमेशा से रही। क्योंकि हमने मां को देखा जो सुबह पांच बजकर घर का सारा काम निपटाकर रात के बर्तन मांजकर और हमारे लिए चाय बनाकर सुबह सात बजे स्कूल चली जाती थीं फिर दिन के बारह बजे आकर खाना खातीं थी। जब तक दीदी की शादी नहीं हुई तब तक तो ठीक था दीदी घर का काम करना और खाना बनाने का काम करती थीं और जब दीदी नहीं होतीं तो पापा भी घर पर भोजन पका चुके होते थे। यही नहीं पापा के भोजन में अलग स्वाद हासिल होता और हम सभी पापा के भोजन में विशेष आनंद महसूस करते। पापा मम्मी के बीच यह सहज जीवन जीने का यह सहज दर्शन बाद में भाई भाभी ने भी अपनाया और शायद यह आगे भी बरकरार रहेगा।
महानगरीय जीवन में बहुत संघर्ष होता है। सुबह से उठे पति पत्नी के लिए अपने अलावा अपने बच्चे और अपने परिवार के लिए विभिन्न मांगों के बीच तारतम्य बैठाना मुश्किल होता जा रहा है। पैसा जीवन के लिए आवश्यक है पैसे के बिना कुछ भी संभव नहीं है। आधुनिक भौतिकतावादी दुनिया में पैसा ही सबकुछ है। लेकिन पैसा क्या हमारे आपसी प्यार आपसी समन्वय और आपसी व्यवहार से भी अधिक महत्वपूर्ण है शायद नहीं। कम से कम इतना महत्वपूर्ण तो कतई नहीं कि एक बात हुई और कह दे   बेच दे  


रविवार, 6 अक्टूबर 2013

सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविण भारतीय क्रिकेट के दो नायाब हीरे, अगर वनडे की ओपनिंग की बात की जाए तो आला रे आला सचिन का जवाब नहीं और भारतीय टेस्ट टीम की बात की जाए तो द्रविण की दीवाल को भेद पाना आसान नहीं .. करीब बीस साल से दोनों प्लेयरों ने अपने-अपने रोल में बखूबी जिम्मेदारी का परिचय दिया। राहुल द्रविण अपेक्षाकृत ज्यादा गंभीर हैं. खेल में भी और खेल के बाहर भी तो सचिन खेल के समय बहुत गंभीर होते हैं लेकिन बच्चों सी चपलता उनके आज भी चेहरे पर दिखाई दे जाती है। सचिन अगर अपने बेटे अर्जुन के साथ भी अगर भारतीय क्रिकेट टीम का ड्रेसिंग रूम शेयरआ करें तो शायद वो अर्जुन से भी मजाक और मस्ती करने से बाज नहीं आएंगे। क्रिकेट की ये दोनों ग्रामर की किताबों ने चैंपियंस लीग फायनल के साथ ही रंगारंग क्रिकेट से अलविदा भी कह दिया है। सचिन तेंदुलकर साल 1989 से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं हालांकि राहुल द्रविण अपेक्षाकृत बाद में भारतीय क्रिकेट में आए लेकिन एक वो भी दौर रहा है जब भारतीय टीम में सचिन सौरव और द्रविण लक्ष्मण को बल्लेबाजी की रीढ़ माना जाता था। सच कहें तो सूचना प्रोद्योगिकी और तकनीक के विकास के साथ क्रिकेट के बढ़ते गौरव में सचिन और राहुल द्रविण की आतिशी पारियों का भी अहम योगदान है। 
याद होंगा आपको साल 1998 शारजाह का मैदान और शेनवार्न की गेंदबाजी धूल भरी आंधियों के बीच वार्न गेंदबाजी कर रहे थे तो सचिन दनादन रन बना रहे थे,वहीं पर्थ टेस्ट में द्रविण की सधी और क्रिकेट की व्याकरण को ध्यान में रखकर खेली गई पारियों को कौन भूल सकता था। श्रीमान डिपेंडबेल यूं ही नहीं कहा जाता है इस महान बल्लेबाज को, कोलकाता में हारने की कगार पर खड़े मैच को जीत में तब्दील करने का खेल अकेले लक्ष्मण के बस का नहीं था अगर लक्ष्मण के साथ द्रविण क्रीज पर ना डटे रहते। 
क्रिकेट की दुनिया के ये दो नायाब हीरे अब रंगारंग कपड़ों में शायद नहीं दिखेंगे। अविस्मरणीय फिटनेस और अविस्मरणीय फुटवर्क के महारथी ये खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट की आने वाली पीढियों के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं है।
जिंदगी की जद्दोजहद शब्द बहुत आसानी से लिखे जा सकते हैं लेकिन इन शब्दों का महत्व वही समझ सकता है जो इन शब्दों को जीता है, कहना बहुत आसान है भई जिंदगी की जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन क्या हम वाकई जिंदगी को इतना महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। माना कि हम नौकरी कर रहे हैं माना कि अपने इलाके से अपने घर से इतने दूर रह रहे हैं लेकिन क्या जिंदगी इसी का पर्याय है। जानवर  भी घास की तलाश में दूर-दूराज के इलाकों में जाते हैं और अल शाम को वापस  लौट आते हैं। कुछ अमीरों के जानवर होते हैं जिन्हें घर पर ही घास मिल जाती है लिहाजा उनके लिए घास की तलाश करना शायद कठिन नहीं होता है फिर भी वह बाहर की हवा खाने के लिए घर से बाहर टहलाये जाते हैं। लेकिन जो जानवर घर पर नहीं चारा नहीं देखते हैं तो फिर वो बाहर निकलते हीं है चाहे अपना खूटा ही क्यों ना तोड़ना पड़े। हम भी कुछ इसी तरह बाहर निकले हुए हैं। 

मंगलवार, 29 मई 2012

कोरबो लोरबो जीतबो रे.... वाकई ममता बनर्जी और शाहरुख खान मे काफी समानता हैं सबसे पहले तो दोनों ही केकेआर के इस स्लोगन का अक्षरश: पालन करते हैं। लड़ने में दोनों माहिर हैं गलती करने के बाद मानते नहीं .. औऱ हां जीतना जानते हैं ममता को कांग्रेस से अलग हुए एक दशक हो गया है लेकिन बंगाल की गद्दी एक साल पहले ही मिली कितना संघर्ष संसद और सड़क पर ममता ने किया ये देश जानता है। सीपीएम से उसका गढ़ छीन लेना और वो भी इतने अंतर से ये ममता का ही माद्दा था। उधर बॉलीवुड के स्वयंभू बादशाह शाहरुख खान ने आईपीएल की फ्रेंचाइजी में पांच साल इनवेस्ट किया है। लगातार असफलता असफलता और असफलता के बाद आखिरकार बाजीगर के हाथ बाजी लग ही गई। शाहरुख खान ने इस दरमियान अपना और अपनी टीम का हौसला बढॉया ही येबात अलहदा है कि वो समय समय पर अपना आपा खोते रहे है लेकिन टीम पर कभी आपा नहीं खोया ... और आखिरकार किंग खान की केकेआऱ ने कोरबो लोरबो के बाद जीतबो रे का उनका सपनापूरा कर ही दिया। अब जब दो एक प्रकृति के लोग मिलते है तो जश्न तोहोगा भले ही सरकारी खर्चे पर हो अपनी बला से ...
दीदी बंगाल का और बंगालियों का मूड बखूबी जानती हैं मां माटी औऱ मानुष की बात करने वाली दीदी को पता है कि बंगाली जनता को कैसे भावुक किया जाता है .... नहीं तो आईपीएल टूर्नामेंट को जीतना कोई इतना गौरव का क्षण नहीं कि इतना बड़ा सम्मान समारोह रखा जाये लेकिन ममता बनर्जी जैसे कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती लेफ्ट बंगाल में आखिरी सासं ले रहा हैं रूढिवादिता की गहरी खोह में बैठे लेफ्ट नेताओं को शायद ये चांस याद भी नहीं होगा...लेकिन ममता ने जैसे कोलकाता वासियों को उनके उत्साह को व्यक्त करने का एक मौका देकर बाजी मार ली है। ... कुछ नहीं करना पड़ा हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा होए ... किराए के खिलाड़ियों और किराए के कोचों से सजी धजी विनर टीम को सरकारी खर्च पर सम्मान देना था नाम दे दिया कोलकाता म्युनिसपिल कारपोरेशन का सम्मान समारोह औरबुला लिया राज्यपाल बंगाल क्रिकेट एसोसियेशन को ... तमाम औपचारिकताओं को पूरा  करके ममता ने एक तरह से जता दिया कि बंगाल केगौरव को याद रखना औरउसे बरकरार रखना जैसे उनकी ही जिम्मेदारी है औऱ वे ये काम बखूबी करना जानती है।

सोमवार, 28 मई 2012

रनडाउन


रन डाउन ... बढ़ी मनमोहक बला है ये है तो रोमन शब्द लेकिन देवनागरी लिपि में लिखे इन दो शब्दों की महत्ता को हम आप तो क्या बच्चा भी जानता है कम से कम पहला शब्द मतलब रन तो हर कोई जानता है। बच्चा दो पैरों पर चलना सीख भी नहीं पाता कि हर बाप उसे सचिन की शक्ल में देखना शुरु कर देता है। बहरहाल रन अगर डाउन होनेलगे तो वो रनडाउन होने लगता है। जैसे हमारे जीवन में मूल्यों का पतन यानि डाउन हो रहा है कुछ वैसे ही ये रनडाउन .. ऊपर से नीचे गिरता है। ये रनडाउन .. कभी कभी तो ये इतना गिरता है कि संभालना मुश्किल हो जाता है विद्या बालन की डर्टी पिक्चर से भी ज्यादा डाउन हो जाता है। हालाकि कहा जाता है कि अंग्रेजी का रनडाउन काफी अच्छा होता है.. हूं होता होगा अपन को क्या ... अपन ठहरे हिंदी वाले ... अण्णा से शुरु होता है तो राखी पर और अगर ज्यादा डाउन हुआ तो पूनम पांडे तक गिरता चला जाता है। 

बुधवार, 16 मार्च 2011

कल जब वेस्टइंडीज और इंग्लैंड अपने मुकाबले में भिड़ेंगे तो ग्रुप बी में उनके दूसरे प्रतिद्वंदी भारत और बांग्लादेश इस खेल पर अपनी निगाहें जमाएं होंगे। इस प्रकार ये मुकाबला काफी दिलचस्प होने जा रहा है। बांग्लादेश ने पहले इंग्लैंड औऱ इसके बाद हालैंड को हराकर क्वार्टर फायनल में पहुंचने की अपनी उम्मीदों को जिंदा रखा है । वहीं इंग्लैंड के साथ टाई खेलकर और अफ्रीका से हारकर भारत भी क्वार्टर फायनल में पहुचने के पहले इस मैच को देखना चाहेगा।