त्रासदी के तीन दशक .. खत्म नहीं हुई त्रासदी
तीन दिसंबर 2015
यानी गैस त्रासदी को हुए इकतीस वर्ष पूरे हो चुके हैं। दो और तीन दिसंबर की
दरम्यानी रात हुए इस भयावह गैस हादसे के दौरान हजारों लोग काल के गाल में समा गए
वहीं लाखों लोग इस त्रासदी का दंश अब भी भोग रहे हैं। भोपाल जो शहर खूबसूरत झीलों
और अपनी बेहतरीन हरियाली के लिए जाना जाता था वही भोपाल अब जहरीली गैस के लिए
पहचान बना चुका है। हालांकि त्रासदी को समाप्त हुए तीस वर्ष से अधिक हो गए हैं।
लेकिन जख्म अभी बाकी है।
आज भी यूनियन कार्बाइड के उस कारखाने और उसके इर्द-गिर्द
जाने पर अब सहज महसूस करेंगे कि यहां फैक्ट्री भले ही खत्म हो गई हो लेकिन उस
फैक्ट्री से निकलने वाली गैस ने कितना कोहराम मचाया होगा। अनगिनत लाशों से पटी
पड़ी भोपाल की उस दौर की सड़कों पर न मालूम कितनी बार डामर का मुलम्मा चढ़ गया है
लेकिन उन लाशों की गर्द अभी भी यहां दफ्न है। इन लाशों पर आज भी राजनीति हो रही
है। और शायद आने वाले समय में भी राजनीतिक रोटियां सेंकी जाएंगी। जिनपर गैस
पीड़ितों ने यकींन किया और अपना नुमाइंदा बनाया वो भी उन्हें विश्वासघात करके चले
गए और जिन्हें इनका ऐतबार हासिल नहीं हुआ वे भी भरोसा बनाए रखने के लिए यहां की
समस्याओं को लेकर सरकार की लानत मलानत करते रहे। हालांकि इन दोनों के बीच फंसे गैस
पीड़ित आज भी नर्क की सी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
कालोनियां बनाई गईं हैं। लेकिन
रहवासी गैस पीड़ित हैं या बाहर के यह तय नहीं। वहीं उस काली रात जिन लोगों को यहां
की जहरीली गैस में सांस लेने को मजबूर होना पड़ा वे आज भी गंभीर बीमारियों से
पीड़ित हैं जिनका इलाज बदस्तूर जारी है। वो मासूम बच्चे जिन्होंने उस काली रात की
दरमियान अपनी जिंदगी का सफऱ शुरु किया वो आज भी अपने जीवन को कोसते हैं वो आज भी
कोख में मर जाने को बेहतर समझते हैं। इन मासूमों की जिंदगी ही उनके लिए नासूर
साबित हो रही है। वो माताएं जो अच्छे और सुखी परिवार का सपना बुन रहीं थीं उन्हें
अब जीवन का सबसे कठोर दंश भोगना पड़ रहा है। इन सबके बीच इस जहरीले गैस कांड का
मुख्य दोषी एंडरसन अब इस दुनिया में नहीं रहा है।


