रविवार, 6 अक्टूबर 2013

सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविण भारतीय क्रिकेट के दो नायाब हीरे, अगर वनडे की ओपनिंग की बात की जाए तो आला रे आला सचिन का जवाब नहीं और भारतीय टेस्ट टीम की बात की जाए तो द्रविण की दीवाल को भेद पाना आसान नहीं .. करीब बीस साल से दोनों प्लेयरों ने अपने-अपने रोल में बखूबी जिम्मेदारी का परिचय दिया। राहुल द्रविण अपेक्षाकृत ज्यादा गंभीर हैं. खेल में भी और खेल के बाहर भी तो सचिन खेल के समय बहुत गंभीर होते हैं लेकिन बच्चों सी चपलता उनके आज भी चेहरे पर दिखाई दे जाती है। सचिन अगर अपने बेटे अर्जुन के साथ भी अगर भारतीय क्रिकेट टीम का ड्रेसिंग रूम शेयरआ करें तो शायद वो अर्जुन से भी मजाक और मस्ती करने से बाज नहीं आएंगे। क्रिकेट की ये दोनों ग्रामर की किताबों ने चैंपियंस लीग फायनल के साथ ही रंगारंग क्रिकेट से अलविदा भी कह दिया है। सचिन तेंदुलकर साल 1989 से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं हालांकि राहुल द्रविण अपेक्षाकृत बाद में भारतीय क्रिकेट में आए लेकिन एक वो भी दौर रहा है जब भारतीय टीम में सचिन सौरव और द्रविण लक्ष्मण को बल्लेबाजी की रीढ़ माना जाता था। सच कहें तो सूचना प्रोद्योगिकी और तकनीक के विकास के साथ क्रिकेट के बढ़ते गौरव में सचिन और राहुल द्रविण की आतिशी पारियों का भी अहम योगदान है। 
याद होंगा आपको साल 1998 शारजाह का मैदान और शेनवार्न की गेंदबाजी धूल भरी आंधियों के बीच वार्न गेंदबाजी कर रहे थे तो सचिन दनादन रन बना रहे थे,वहीं पर्थ टेस्ट में द्रविण की सधी और क्रिकेट की व्याकरण को ध्यान में रखकर खेली गई पारियों को कौन भूल सकता था। श्रीमान डिपेंडबेल यूं ही नहीं कहा जाता है इस महान बल्लेबाज को, कोलकाता में हारने की कगार पर खड़े मैच को जीत में तब्दील करने का खेल अकेले लक्ष्मण के बस का नहीं था अगर लक्ष्मण के साथ द्रविण क्रीज पर ना डटे रहते। 
क्रिकेट की दुनिया के ये दो नायाब हीरे अब रंगारंग कपड़ों में शायद नहीं दिखेंगे। अविस्मरणीय फिटनेस और अविस्मरणीय फुटवर्क के महारथी ये खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट की आने वाली पीढियों के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं है।
जिंदगी की जद्दोजहद शब्द बहुत आसानी से लिखे जा सकते हैं लेकिन इन शब्दों का महत्व वही समझ सकता है जो इन शब्दों को जीता है, कहना बहुत आसान है भई जिंदगी की जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन क्या हम वाकई जिंदगी को इतना महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। माना कि हम नौकरी कर रहे हैं माना कि अपने इलाके से अपने घर से इतने दूर रह रहे हैं लेकिन क्या जिंदगी इसी का पर्याय है। जानवर  भी घास की तलाश में दूर-दूराज के इलाकों में जाते हैं और अल शाम को वापस  लौट आते हैं। कुछ अमीरों के जानवर होते हैं जिन्हें घर पर ही घास मिल जाती है लिहाजा उनके लिए घास की तलाश करना शायद कठिन नहीं होता है फिर भी वह बाहर की हवा खाने के लिए घर से बाहर टहलाये जाते हैं। लेकिन जो जानवर घर पर नहीं चारा नहीं देखते हैं तो फिर वो बाहर निकलते हीं है चाहे अपना खूटा ही क्यों ना तोड़ना पड़े। हम भी कुछ इसी तरह बाहर निकले हुए हैं।