रविवार, 6 अक्टूबर 2013

जिंदगी की जद्दोजहद शब्द बहुत आसानी से लिखे जा सकते हैं लेकिन इन शब्दों का महत्व वही समझ सकता है जो इन शब्दों को जीता है, कहना बहुत आसान है भई जिंदगी की जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन क्या हम वाकई जिंदगी को इतना महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। माना कि हम नौकरी कर रहे हैं माना कि अपने इलाके से अपने घर से इतने दूर रह रहे हैं लेकिन क्या जिंदगी इसी का पर्याय है। जानवर  भी घास की तलाश में दूर-दूराज के इलाकों में जाते हैं और अल शाम को वापस  लौट आते हैं। कुछ अमीरों के जानवर होते हैं जिन्हें घर पर ही घास मिल जाती है लिहाजा उनके लिए घास की तलाश करना शायद कठिन नहीं होता है फिर भी वह बाहर की हवा खाने के लिए घर से बाहर टहलाये जाते हैं। लेकिन जो जानवर घर पर नहीं चारा नहीं देखते हैं तो फिर वो बाहर निकलते हीं है चाहे अपना खूटा ही क्यों ना तोड़ना पड़े। हम भी कुछ इसी तरह बाहर निकले हुए हैं। 

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